इक राह तो वो होगी, तुम तक जो पहुंचती है
बहुत देर से सोच रहा था की इक जोरदार पोस्ट लिखूंगा तुम्हारे लिए, लेकिन अब जब लिखने बैठा हू तो सोच रहा हू की क्या लिख सकता हूं??
सोचता था की भोपाल से यू ही विदा ले लेगे न कोई साथी और न
कोई दोस्त, लेकिन जाते जाते एक से बढ़ के एक अकड़ू, बद्तमीज़ और घमंडी लोंगो के बीच तुम मिल ही गयी,
दुनिया की सबसे खुशमिज़ाज़ दोस्त जिसके साथ रूह भी सुकून पाती है।
बस कुछ ही महीने पहले की बात है जब देखा था पहली नजर तुम्हे।
आज के इस भागम-भाग दौर के एकदम विपरीत जो हर वक्त दूसरे की मदद करने को तैयार रहती
है , इंसान के नाते, इसके बदले चाहिए
क्या ??? रूपये -पैसे या
कोई कीमती चीज़ ...... नहीं नहीं कुछ नहीं सिर्फ चाहिए तो थोड़ा सा सुकून, थोड़ा सा स्नेह और बस थोड़ा सा प्रेम।
यही वजह है की जब भी मेरा मन उदाश होता है, या जब भी कोई
दिल दुखाता है, तो दिल में ख्याल सिर्फ तुम्हारा आता है। सिर्फ तुम्हे याद करते है,
घंटों ऐसे ही बीत जाते हैं,
पता नहीं कब
उदासियों की भी सुबह हो जाती है और मालूम भी नहीं पड़ता।
तुम्हे इक बात बताये.... मुझे तूम्हारे हर उस अदा से
मुहब्बत है, जो तुम से
वाबस्ता है…. लोगों के हुजूम में तुम्हें देखकर ऐसा लगता है, जैसे चांद ख़ुद
ज़मीं पर उतर आया हो... सच तुम इस ज़मीं का चांद ही तो हो, जिसे देखते रहने
मात्र से मेरी ज़िन्दगी में उजाला बिखरते रहता है...।। बहुत याद आती हो तुम...
बहुत....बहुत.....बहुत ज्यादा........।।।।।।
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